अजित के बाद राजनीति बदली: NCP का ‘रीयूनियन’ लगभग तय था!

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। डिप्टी सीएम अजित पवार के असामयिक निधन के बाद जहां एक ओर सत्ता संतुलन को लेकर असमंजस बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर एक बड़ा राजनीतिक सच सामने आया है—एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की बातचीत वास्तव में काफी आगे बढ़ चुकी थी।

अब यह सिर्फ अटकल नहीं, बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा पुष्टि किया गया तथ्य है।

8 फरवरी को होने वाला था बड़ा ऐलान

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अजित पवार गुट और शरद पवार गुट 8 फरवरी को औपचारिक विलय की घोषणा करने वाले थे।

सूत्रों के अनुसार, जिला परिषद चुनावों के बाद merger plan public होना था। संगठनात्मक ढांचे और मंत्रिमंडल संतुलन पर बातचीत हो चुकी थी। कुछ नए चेहरों को सरकार में लाने पर भी अनौपचारिक सहमति थी। लेकिन अजित पवार के निधन ने इस पूरे राजनीतिक रोडमैप को अचानक रोक दिया।

NCP नेताओं ने की आधिकारिक पुष्टि

एनसीपी (एसपी) के वरिष्ठ विधायक जयंत पाटिल और शशिकांत शिंदे ने इस बात की पुष्टि की है कि “विलय की बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी थी और नियमित बैठकें हो रही थीं।”

जयंत पाटिल ने बताया कि 16 जनवरी को उनके आवास पर बैठक हुई। 17 जनवरी को शरद पवार के घर पर अगली चर्चा हुई। उद्देश्य था—साथ मिलकर आगे की चुनावी रणनीति तय करना।

सत्ता में वापसी की रणनीति?

सूत्रों का दावा है कि यह संभावित विलय सिर्फ संगठनात्मक नहीं, बल्कि सरकार में शामिल होने की रणनीति का हिस्सा था।

वर्तमान स्थिति Ajit Pawar-led NCP → BJP-शिवसेना वाली महायुति सरकार में। Sharad Pawar-led NCP (SP) → कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के साथ MVA में।

विलय की स्थिति में यह समीकरण पूरी तरह बदल सकता था—और यही वजह है कि BJP और MVA, दोनों खेमों में बेचैनी थी।

Baramati Meeting: शोक के बीच राजनीति

बुधवार देर रात बारामती में अजित पवार को श्रद्धांजलि देने पहुंचे वरिष्ठ एनसीपी नेताओं ने एक closed-door consultation भी की। इस बैठक में बदली राजनीतिक परिस्थितियों, पार्टी की अगली दिशा और merger talks को लेकर आगे की रणनीति पर चर्चा हुई।

अजित पवार का निधन सिर्फ एक व्यक्तिगत क्षति नहीं, यह महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति का टर्निंग पॉइंट बन गया है। अब सवाल यह नहीं कि merger talks थीं या नहीं सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया अब रुकेगी या नए रूप में आगे बढ़ेगी?

राजनीति में शून्य कभी स्थायी नहीं रहता।

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